Wednesday, October 8, 2014

9 अक्टूबर ......कौमनष्ट watch ........

कौमनष्ट watch .........
किसी जमाने में धरती पे एक कौम थी . धीरे धीरे वो नष्ट हो गयी ......... कुछ समाज विज्ञानियों ने समय रहते ये पहचान लिया था की ये कौम नष्ट हो जायेगी ....... इसलिए इन्होने इनके संरक्षण के प्रयास शुरू किये.......... सबसे पहले तो इनको endangered species में रखा ......... इनके पंजे गिने गए ....... इनको सरकारी खुराक पे पालना शुरू किया ......इनके लिए JNU जैसे अभयारण्य बनाए ..........अभयारण्य बोले तो sanctuary ......जहां ये निश्चिन्त हो के चर खा सकें ......... सरकार ने भी ये बेवस्था की की इनकी सुरक्षा हो ....सुरक्षा बोले तो इनको मार के कोई खाल न उतार ले .....यानि कोई इनको पटक के मारने न पाए ........
जो गिनती के कौम नष्ट बचे थे उन्हें महत्वपूर्ण पदों पे बैठाया ...मसलन इतिहासकार......... पत्रकार ........कलाकार ........ फिल्मकार .....कहने का मतलब ऐसे पदों पे बैठाया जहां ये कार नामे कर सकें .......... सरकारी संरक्षण के परिणाम जल्दी ही दिखने लगे और ये खा खा के मोटा गए ......और इनके पिछवाड़े यानी posterior cavity के इर्द गिर्द चर्बी की मोटी परत जम गयी .......... दुनिया भर में रिसर्च हुई की ये प्रजाति आखिर लुप्त क्यों हो रही है .....पाया गया की इनके DNA में ही दोष है ........
समाज में भी धीरे धीरे इनको ले के जागरूकता आई .......... लोग इनको watch करने लगे ....... नज़र रखने लगे .....क्या खाते हैं ....कहाँ रहते हैं ......इनको खुराक कहाँ से मिलती है ...... आदतें क्या हैं ....... किस खुराक से जल्दी मोटाते हैं .......
मैंने भी एक कौमनष्ट के गले में collar पहनाया है .......आजकल उसका सिग्नल उधर hongkong और नेपाल के जंगलों से मिल रहा है ........ उसके पीछे कैमरा लगा दिया है ....... सारा दिन हुआँ हुआँ करता है ...... उसकी हुआँ हुआँ पे एक साथ बहुत से शांति दूत कू कू भौ भौ करते हैं ........ इधर देखा गया है की उसकी हर आवाज़ पे शांति के पुजारी ज़्यादा बोलते हैं .......
मेरा कैमरा लगा है पीछे ....उसपे कड़ी नज़र है ....... सारी रिपोर्ट देता रहूँगा .....आप लोग भी नज़र रखिये ...........
क्रमशः ...............

Tuesday, October 7, 2014

27 september गुलज़ार साहब की आखिरी फिल्म ..........

gulzaar साहब ने 1999 में " हू तू तू " बनायी थी . वो उनकी अंतिम फिल्म थी .......उसके बाद उन्होंने फिर कभी फिल्म नहीं बनायी ........ ऐसे बहुत से फिल्मकार हुए हैं जिन्होंने एक से एक बेहतरीन फिल्में बनायी फिर वो अचानक सीन से गायब हो गए ........ मुज़फ्फर अली ..........उमराव जान के बाद कभी कोई फिल्म नहीं आई उनकी ...... हालांकि कोशिश उन्होंने बहुत की , पर बना न सके ...कई फिल्में story और script से आगे न बढ़ी तो कुछ आधी बन के बंद हो गयी ........ पर गुलज़ार साहब के साथ ऐसा कुछ न हुआ ......उन्होंने हू तू तू के बाद फिल्म मेकिंग से तौबा ही कर ली .........

कई बार लोगों ने उनसे पूछा की फिल्में बनाना क्यों बंद कर दिया .......उन्होंने हमेशा इस सवाल को टाल दिया .........कई बार यूँ बोले कि मैं मूलतः कवि हूँ .....लेखक हूँ .......मुझे लगा की थोड़े से दिन बचे हैं और इतना कुछ लिखना पढ़ना बाकी है इसलिए अब सिर्फ लिखने पढने में समय देता हूँ ........

दरअसल गुलज़ार साहब ने अपने दिल का दर्द कभी बताया नहीं किसी को ..........पर कुछ गिने चुने लोग तो जानते ही थे ......उनमे एक विशाल भारद्वाज हैं और एक तब्बू .......हाल ही में एक इंटरव्यू में विशाल भारद्वाज ने वो राज़ खोल दिया .......

दरअसल हू तू तू , जो हमने आपने देखी , वो वो हू तू तू नहीं थी जो गुलज़ार साहब ने बनायी थी .......जो फिल्म उन्होंने बनायी वो कुछ और थी ....... फिल्म के निर्माता धीरज लाल शाह को फिल्म का अंत पसंद न आया ........... उसने गुलज़ार साहब से कहा कि बदल दीजिये ....... गुलज़ार साहब ने कहा .....लाला .......गुलज़ार की फिल्म है ....... लाला के समोसे नहीं ......... शाह जी बोले , गुलज़ार साहब पैसे लगे हैं मेरे ........ मेरा माल है ....... क्यों मुझे कंगाल करने पे लगे हैं .......गुलज़ार साहब ने कहा की शाह जी , अगर फिल्म न चली तो आपका कुछ नुक्सान होगा .............. पर आप कंगाल न होंगे ........आपने फिल्म बदल दी तो गुलज़ार तो कहीं का न रहेगा ..........शाह जी को बात समझ न आई ...........गुलज़ार साहब मीटिंग छोड़ के चले गए ....... और फिर कभी लौट के न आये ......... शाह जी ने फिल्म का अंत अपने हिसाब से शूट करवा के अपने हिसाब से एडिट कर के रिलीज़ कर दी ...........

गुलज़ार साहब ने उसके बाद ज़िन्दगी में फिर कभी फिल्म नहीं बनायी ............

27 september ...अजी कोई हवा नहीं ....ये तो ब्लोअर की हवा है

अजी कोई हवा नहीं है .......अरे ये तो ब्लोअर की हवा है 

अरे कोई सुनामी नहीं ....ये तो सु सु नामी है .....

सिर्फ मार्केटिंग है ...... event management है .........

ये सपना सपना ही रह जाएगा .......कभी पूरा नहीं होगा ........

जानता है की असली लालकिले पे चढ़ने को नहीं मिलेगा कभी भी ....इसलिए नकली लालकिले से बोलता है ..........

अजी भाड़े की भीड़ है ........ मार्केटिंग बहुत अच्छी करता है बस .......

अरे छोटा मोटा रीजनल लीडर है ....जानता कौन है गुजरात के बाहर ......राहुल बाबा तो नेशनल लीडर हैं .......

राष्ट्रीय राजनीति का कोई अनुभव ही नहीं इसको ....... भारत बहुत जटिल देश है ....इसको सम्हाल ही नहीं पायेगा .......

अरे अंग्रेजी तो जानता ही नहीं .......

मुसलमान कभी नहीं बनने देंगे ...... मुसलामानों को नाराज़ कर के कोई चुनाव जीत ही नहीं सकता ........

160 से ऊपर आयेंगी नहीं ........राज नथवा ही नहीं बनने देगा ........ समर्थन कौन देगा ......10 सीट भी कम रह गयी तो नहीं जुटा पायेगा ........

गोधरा ....सोहराबुद्दीन ......इशरत ....... जुहापुरा ....... गोल टोपी ...... नरसंहार ......आदमखोर ........ पिरान्हा ....... अहसान जाफरी ....... ज़किया जाफरी .....सीतलवाड़ ........ बुर्का दत्त ......राजदीप ...... सागरिका .......

खुजलीवाल मोदी का रथ रोक लेगा ..........

नकली है ये central park भी ......fotoshop है ये भीड़ .......

नहीईईईईईईई........

नहीईईईईईईईईई .....................

कह दो की ये सब झूठ है ......... मेरा दिल कहता है की ऐसा हो नहीं सकता ...........

झूठ है ये ..........

26 september ......फेसबुक से निकलेंगे प्रेमचंद

बहुत लम्बी लम्बी यात्राएं भी उस एक पहले कदम से ही शुरू होती हैं . वो जो अभी खड़े तक होना नहीं जानते , बड़ी मुश्किल से घिसट के चलते हैं , किसी की ऊँगली पकड़ के बमुश्किल खड़े होते हैं ..........और जब पहला कदम उठाते हैं तो लडखडा के गिर जाते हैं ........ मैंने देखा है उनको कुछ दिन बाद दुनिया की लम्बाई नापते हुए ......... 

आज मैं एक बात लिख रहा हूँ ........ इसे नोट कर लेना ......संभव हो तो सहेज लेना कहीं ......इस धरती पे आज तक जो कुछ भी लिखा गया .....जितना साहित्य लिखा गया उस से ज़्यादा अगले बीस सालों में लिखा जाएगा .......

एक बार सैदपुर, गाजीपुर में हमारे स्कूल में हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार श्री जितेन्द्र नाथ जी पाठक आये ......वो हाल ही में एक college के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए थे . मैंने उनसे कहा की बच्चों को कुछ बताइए .......वो कैसे लिखना सीख सकते हैं .......उन्होंने एक simple सा सूत्र दिया .....छोटे छोटे एक दो लाइन के सन्देश लिखो .....अपनी दैनिक डायरी लिखो ....दो चार लाइन में खुद को व्यक्त करो .....कविता की दो ही लाइन लिखो ....न हो तो तुकबंदी ही भिड़ाओ ......... स्कूल में बच्चों को लाख प्रेरित करने के बाद भी हम उन्हें ये न सिखा पाए ............

आज फेसबुक और twitter वही कर रहा है ....... बड़े सहज तरीके से कर रहा है .......लोगों में स्वतः स्फूर्त प्रेरणा आ रही है ........अक्सर मुझे युवा inbox में मेसेज करते हैं ....sir , आपका लिखा पढने में बहुत मज़ा आता है ........ मैं उनसे कहता हूँ आप भी लिखा करें .....झिझक होती है ......कोई बात नहीं एक लाइन का कमेंट ही लिखिए ........ बहुत से ऐसे बच्चों को मैंने देखा जो एक लाइन के कमेंट से शुरू हुए और अब 2-4 महीने बाद अच्छी खासी पोस्ट लिख रहे हैं .........

हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था हमारे छात्रों को जो चीज़ 10-15 बरस में नहीं सिखा पाती , वो फेसबुक और twitter महीने दो महीने में सिखा दे रहे हैं .........अभिव्यक्ति ............ और मात्र 6 महीने में मैंने अपने कुछ मित्रों को देखा जो बिलकुल नहीं लिखते थे आजकल क्या गज़ब का लिख रहे हैं ......... एक से एक बेहतरीन पोस्ट ........एक से एक किस्सागो निकल रहे हैं .........

आने वाले सालों में सैकड़ों नहीं हज़ारों लाखों " मुंशी प्रेमचंद " पैदा होंगे फेसबुक से ..........

26 september .......secularism अनाथ हो गया है

बहुत बुरी खबर है ........ jungle में बहुत से अनाथ बच्चे जो भूख से बिलबिला रहे थे ....वो जिनकी माँ उनको जन्म देते ही मर गयी थी ......कुछ ऐसे थे जिन्हें उनकी माँ छोड़ के अपने प्रेमी के साथ भग गयी थी ....... और कुछ ऐसे भी थे जिनकी माँ मरणासन्न थी .........और बहुत से ऐसे थे जिनकी माँ को दूध ही न उतरा ......... वो सब बच्चे अलग अलग species के ........... उनको एक माँ मिल गयी थी ........वो जिसके 18 जोड़ी थन थे .......और वो की जिसके थानों से दूध टपकता था ......वो जो की jungle में लेट के सब अनाथ बच्चों को दूध पिलाया करती थी ........ कितनी भोली थी वो ..... उसने कभी ये न देखा की भेड़िये पी रहे हैं या लकड़ बग्घे या फिर गधे या सूअर ........ चाहे आम हो या ख़ास , सबको पिलाती थी .......... यूँ कहते हैं की उसका दूध सूख गया है .........

पिछले तीन दिन में सिर्फ 2686 , 1462 रु और 3983 रु चन्दा उतरा है ....... एक वो भी ज़माना था जब करोड़ों आया करते थे ......... यूँ बताते हैं की जगत अम्मा को अब दूध नहीं हो रहा .....क्या होगा उन अनाथ बेसहारा बच्चों का ........

आम आदमी पार्टी मरणासन्न है ........चंदा मिलना बंद हो गया बताते हैं ....... क्या होगा अब कौमनष्टों का .....और कांग्रेसियों का .......गांधीवादियों का और समाजवादियों का ........और सभी seculars का .....वो जो चिपट गए थे आप की छाती से .......ये सोच के की यही रोक लेगा रथ ......थाम लेगा लगाम अश्वमेध के घोड़े की ..........

कल मैंने देखा की कुछ अनाथ तो फिर से secularism की सूखी चूंची चिचोर रहे हैं .........अरे नालायकों .....कब का सूख चूका है दूध secularism की छातियों में ........अब तो खून रिसता है ............

26 september .......जंगल बड़ा बेरहम होता है


discovery चैनल से मैंने एक बात सीखी .......... अगर आप शेर के बच्चे हो तो ये ज़रूरी नहीं की आप भी शेर ही हो .......... कोई जन्मजात शेर नहीं होता ..........शेर बनना पड़ता है .........

discovery पे एक बड़ी मशहूर film है .....अक्सर आती है ........उसमे एक wildlife वैज्ञानिक को एक अनाथ टाइगर मिल गया था और उन्होंने उसे पाल लिया .........फिर जब वो वयस्क होने को आया तो उन्हें चिंता हुई की इसे तो jungle में छोड़ना पडेगा और ये तो जंगल के लिए फिट ही नहीं .......ये तो चूहा भी नहीं मार सकता ........ और वहाँ तो jungle है भैया .........और jungle बड़ा बेरहम होता है ...........

और फिर यूँ हुआ की उस वैज्ञानिक दंपत्ति ने उस टाइगर को दो साल तक जंगल में रहने का प्रशिक्षण दिया ........उसे शिकार करना भी सिखाया .......और जब उन्हें लगा की अब वो सब सीख गया है तो उन्होंने उसे collar पहना के छोड़ दिया .....और फिर 15 दिन बाद , जब वो उसे खोजते हुए आये , ये देखने की उनका लाडला कैसा है .....तो वहाँ झाड़ियों में सिर्फ वो collar मिला जिसमे transmitter लगा था ......लाडले को तो लकड़बग्घे मार कर खा गए थे अगले ही दिन ..........

बचपन मखमली कालीन पे अगर बीता हो तो जंगल रहम नहीं करेगा .......जंगल में तो वही जियेगा और जीतेगा जो पहले दिन से ही काँटों में पला और हर दिन जो जान हथेली पे ले के घूमा ........

यही फर्क है मोदी में और राहुल में .........

मैं अपने बच्चों को हमेशा यही बताता हूँ की वहाँ एक jungle है और jungle बड़ा बेरहम होता है .......... jungle में जीना सीखो ..........


26 september 

गाजीपुर में मेरे गाँव से कोई 10 किलोमीटर दूर एक गाँव है जहां का एक परिवार खानदानी पहलवान है . उसमे दादा बहुत तगड़े पहलवान हुए ......फिर उनके दो लड़के वो दोनों भी 100-100 किलो के रुस्तम हुए .......अब तीसरी पीढी में लड़के भरी जवानी में 60 किलो के हैं ........ यूँ ही बातचीत में मेरे बेटे ने एक दिन पूछ लिया की यहाँ UP में जितने पुराने बड़े पहलवान हुए उनके बेटे क्यों सब 60-70 किलो के रह गए ?

मैंने उसे बताया की तुम्हारे दादा जी , यानि मेरे पिता जी 5 फुट 3 इंच के थे ........ उनका विवाह हुआ सहारनपुर यानि मेरी ननिहाल गाजीपुर से कोई 900 km दूर सहारनपुर में है ........ मेरी height हुई 5 फुट 8.5 इंच ........... फिर मेरी शादी गाजीपुर से कोई 1200 km दूर जालंधर में हुई ........ तुम्हारी height 6 फुट 2 इंच है .......... यानि हर पीढी में औसत 5-6 इंच की वृद्धि ........ दादा जी 60 किलो के पहलवान थे , मैं 82 किलो का हुआ दिग्विजय 114 किलो का हुआ .......... औसतन हर पीढी में 20-30 किलो की वृद्धि ........

समझे बेटा ? ये genetic साइंस है ........ इसको हमारे पूर्वज आज से हज़ारों साल पहले भी समझते थे .........दुहिता दुर्हिता दूरेहिता भवतीति .......निरूक्‍त....... हमारे पूर्वज आज से हज़ारों साल पहले भी ये समझते थे की बेटी की शादी दूर .........बहुत दूर .......करनी चाहिए .......... महाभारत काल में दिल्ली वालों की ससुराल इरान , अफगानिस्तान , चीन और मंगोलिया तक होनी बतायी गयी है ..........

पर फिलहाल हमारे यहाँ गाजीपुर में सादी बियाह 2-4 किलोमीटर में हो रहा है .......बहुत हुआ तो 10-20 km दूर चले गए ........ 40-50 km को तो बहुत ज़्यादा दूर मान लिया जाता है ......... शायद यही कारण है की संतानें शारीरिक रूप से कमज़ोर होती जा रही हैं ....... रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम ......मेधा और बुद्धि पे भी इसका असर होता ही है .......

हमने बेटे को समझा दिया है .....कम से कम 1600 km .......इस से ज़्यादा 16, 000 km भी हो जाए तो परवाह नहीं .......... पहलवानी में super heavy वेट अब 125 kg तक हो गया है ........