Thursday, October 9, 2014

4 oct ........125 करोड़ wilder beasts

याद है जापान की सुनामी .तबाही का ऐसा भयानक मंजर मैंने अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा . इतनी बड़ी आपदा आयी . सब कुछ बर्बाद हो गया . पर उस आपदा में भी जापानियों का व्यवहार देखने लायक था . उन दिनों फेस बुक ऐसी पोस्ट्स से भरा हुआ था की जापानी संकट में कैसे व्यवहार करते हैं ........हर जापानी को पता है की किस संकट में क्या करना है ...भूकंप आये तो क्या करना है , सुनामी आये तो क्या करना है ? कहाँ भागना है ....शायद ये भी बताया जाता है की भागना नहीं है ........कैसे बचना है ....पहले बुज़ुर्ग निकलेंगे फिर बच्चे और महिलाएं ....... जापानियों को यह भी सिखाया जाता है की विपत्ति के समय सिर्फ और सिर्फ एक समय का भोजन ही एकत्र करना है ....और ये की बिकुल भी रोना , चीखना चिल्लाना या उत्तेजित नहीं होना है ......पैनिक नहीं होना है .......डरना नहीं है .......
हिन्दुस्तान आज तक अपने लोगों को ट्रेन में चढ़ना नहीं सिखा पाया ....ट्रेन रुकते ही टूट पड़ते हैं .......रोजाना भगदड़ के समाचार आने लगे हैं ......... अफवाह फैलने पे नमक जैसी चीज़ की भी hoarding करने लगते हैं ........ जिस मुल्क को आज तक थूकना हगना मूतना नहीं आया वो सुनामी और भूकंप में क्या करेगा .......
मोदी जी .....125 करोड़ wilder beasts का मुल्क हो गया ....... सबसे पहले पढ़ा लिखा के आदमी बनाओ भैया ...छोडो मंगल यान .......पहले हमको उठाना बैठना चलना , हगना, मूतना , थूकना , सड़क पार करना , कूड़ा फेंकना सिखाओ .......
नहीं तो रोजाना यूँ ही एक दुसरे को कुचलेंगे .....भगदड़ में मरेंगे .........

3 october...............किताबों की दूकान में भी भगदड़ मचती ..........

गाँधी मैदान में मेला देखने गए थे . क्या मिलता है सालों को इन मेलों में ? गए हैं कभी आप ? गंदे घटिया unhygienic से स्टाल होते हैं गोलगप्पों के , पकोड़े और गन्दी घटिया जलेबियों के , और पटरी पे बिकने वाला घटिया सामान 5-5 रु वाला ........ भीड़ भक्खड , धूल और गर्दो गुबार ........ क्या घटिया स्तर है यार, लोगों के एंटरटेनमेंट का .......क्या लेने जाते हैं इन मेलों में ....जान देने लोगों के पैरों तले कुचल के .....भगदड़ में ........
और ये साले शहरी लौंडे .....साले अगरबत्ती छाप cool dudes ....वो जिनकी jeans बस गिर ही जाना चाहती है सरक के , और ये छिछोरी लडकियां .....घूमने चल देते हैं मॉल में ? क्या है क्या इन malls में ? दूकान सजी है , महंगे सामान से , जिसे सिर्फ देख के, निहार के चले आते है ........ ललचाई निगाहों से ...... window shopping कहते हैं उसे शायद ........ कितना घटिया स्तर है एंटरटेनमेंट का .........
जहां भी देखता हूँ किताबों की कोई दुकान , ठिठक जाता हूँ ......और कितनी भी जल्दी में क्यों न हूँ ....... एक बार रुक के देख ही लेता हूँ , सड़क की फुटपाथ पे सजी दुकान पुरानी second hand किताबों की ......... और घंटों बिता देता हूँ किताबों की दुकानों में , उन्हें निहारता , छूता , देखता सहलाता और पलटता ......... कमबख्त आजकल पॉलिथीन की पन्नी में लपेट देते हैं ...........और वो मादक सी गंध किताबों की, जो आती है इन दुकानों में, किताबों की ...... मेरी बीवी बच्चों से कहती है ,सनकी है तुम्हारा बाप .....पता नहीं क्या मज़ा आता है इसे किताबों की दूकान में .......
काश ........... कभी किताबों की दूकान में भी भगदड़ मचती ..........

6 oct .........छौंकी हुई दाल

बहुत साल पहले जब हमारे परिवार में अलगा गुजारी हुई तो हमारे पिता जी ने पुश्तैनी घर में हिस्सा न लिया और घर के बगल में पड़े खाली प्लाट में ही नया घर बनाया ........... सो उस प्लाट के पीछे एक कुम्हार परिवार रहा करता था ......उस जमाने में जब जमींदारी थी और ज़मीनें इफरात होती थी तो बाबू साहब लोग " परजा परजुनिया " को वहीं अगल बगल ही बसा दिया करते थे ....... सोच ये थी की वहीं अगल बगल रहेगा तो दिन रात सेवा में लगा रहेगा ....सो उस कुम्हार के दादा को हमारे दादा ने बसाया था कभी .......... प्रजा जब थी , तब थी . बाद में प्रजा अपना भूखा पेट ले कर दिल्ली बम्बई चली गयी और वहाँ खटने कमाने लगी . इधर बाबू साहब के लड़के ....... वो जिनके दरवाजे पे कभी हाथी झूमता था , वो उस हाथी का सिक्कड़ लिए घूमते थे ....... सो हमारे लौंडे सिक्कड़ घुमाते रह गए वो मेहनती लोग कमा के आगे बढ़ गए .......... सो वो कुम्हार भी कही दिल्ली मुंबई रहता कमाता था और उसके बीवी बच्चे यही गाँव में रहते थे .
तो उस दिन सुबह सुबह हमारी ताई जी और एक दो अन्य महिलाएं आयी हुई थी ......हमारे भैया ने घर के पिछवाड़े शानदार मखमली घास का लॉन बनवाया था और वहीं बैठ के " ठकुराईन " लोग चाय पी रही थी ........ बड़ा खुशनुमा माहौल था ......... गप्प चकल्लस हो रही थी ........ तभी छन्न से आवाज़ आयी ....... वो आवाज़ जी गरम तेल में प्याज डालने से आती है .........और हवा में भुने हुए जीरे की खुशबू तैरने लगी .......... " ठकुरहन " में अचानक सन्नाटा छा गया . फिर हमारी ताई जी बोलीं ....... " आज कल बड़ा छौंक के दाल बनत हौ " ................ठकुरायिनों का मूड off हो गया और चाय पार्टी आनन् फानन में बर्खास्त हो गयी ........ कुम्हारिन की दाल का छौंका ठाकुरायिनों से बर्दाश्त न हुआ .........
मैं वहीं बगल में बैठा था . बहुत देर तक सोचता रहा ........यही तो है सामंतवाद ........जो हमारी जड़ों में गहरे बैठा है आज भी ...... गरीब के घर से भुने हुए जीरे की महक बर्दाश्त न हुई ......... साल दो साल के भीतर ही हमने उस कुम्हार के परिवार को उजाड़ दिया वहाँ से जो हमारे घर के मखमल में पैबंद सा था ......... उसने वहाँ कोंहरान में अपने लोगों के बीच घर बना लिया ............
समय का चक्र पूरा हुआ ....... आज वहीं , ठीक उसी प्लाट पे जहां उस कुम्हार का टूटा हुआ घर था ....... " उदयन " शुरू होने जा रहा है ......... उसी वर्ग के बच्चों के लिए जिसे हमने एक दिन उजाड़ा था .........

6 oct ...........चचा पाकिस्तानी .....

एक चचा जान थे हमारे ....... संयुक्त परिवार था हमारा .....चचा जान को एक दिन इल्हाम हुआ की हमारे साथ नहीं रह सकते .........दादा हमारे बोले ...काहें भैया का हो गवा ? बोले बस अलग कर दो ......आप लोगों के साथ रहना बड़ा मुश्किल है ........आपके साथ न खान पान मिलता है , न रहन सहन ........इसलिए अलगा दो ...... महीनों झगडा करते रहे ........ दद्दू अलगाय दिए .......... जमीन जायदाद सब बाँट दिए .....घर में दीवार बना दिए .......बोले उस पार तुम्हारा .....जाओ .......चच्चू अपने अंडा बच्चा को डंका दिए .....दूकान दौरी खटिया मचिया जो हिस्से में आयी थी , सब ले गए .........
अगले दिन जब दद्दू सो के उठे तो देखते हैं की चाचू वहीं दलान में लुंगी पहन के दतुअन रगड़ रहे हैं ....... दद्दू बोले का हुआ ? गए नहीं ?
हम काहे जाएँ ? हमरा घर है ? हमरे बाप दादा यहीं रहते आये हम काहें जाएँ भला ? जिनगी भर एही दालान में खेले .......एही नीब पे चढ़ के दतुअन तोड़े ....... एका छोड़ के हम काहे जाएँ ?
दद्दू थे हमारे एक नंबर के चूतिया आदमी .......... चचवा इनको ज्ञान दे रहा था और ये ले रहे थे .......उलाट के मारते साले को वहीं चार लात .......भक्क्क साले ...........अब दद्दू हमको ज्ञान देते हैं ? कहाँ जाएगा बेचारा ?
अब चाचू के लड़के फिर अलापने लगे हैं ......हम साथ नहीं रह सकते ........ तुम साले आरती गाते हो तो हमको खलल पड़ता है ........माइक उतारो ...... विसर्जन मत करो .....हमको नमाज़ पढनी है .....खलल पड़ता है .
छपरा का latest दंगा इसलिए हुआ की पुलिस एवं प्रशासन ने विसर्जन रोक दिया और मूर्तियों से माइक बंद करवाया .........बोले ईद के नमाज़ में खलल पडेगा ....... दंगा हो गया .....
का चचा ?????? तब्बे इस्लामाबाद , पेशावर लाहौर , कराची चले गए होते तो ईद की नमाज़ में खलल नहीं न पड़ता ........ और दद्दू साले मर गए खलाल हमारे कपार पे छोड़ गए ........

8 अक्टूबर .........माँ जैसी प्रिंसिपल

1970 में , मैं 5 साल का था . सिकंदराबाद के किसी cantt में रहते थे . वहाँ त्रिमलगिरी केंद्रीय विद्यालय में मेरा एडमिशन हुआ . 5 साल का था मैं ....... उस जमाने में गर्भस्थ शिशु का स्कूल में एडमीशन कराने की परम्परा न थी और प्री नर्सरी , नर्सरी , Lkg और Ukg इत्यादि कक्षाएं न हुआ करती थी . सीधे 1st में ही जाते थे बच्चे . हमारी क्लास की जो क्लास टीचर होती थी उसके दांत बाहर को थे ...वो जिन्हें rabbit tooth कहते हैं आजकल . उस जमाने में शायद ये orthodontics का चलन न था .........उसको मेरी माँ दतखोड़ी कहती थी . सो दतखोड़ी की शक्ल मुझे आज 45 साल बाद भी याद हैं .......उस शक्ल को कौन भूल सकता है भला ?
मैं छोटा सा बच्चा ....... क्लास में अपने क्लास टीचर के पास गया , उसी दतखोड़ी के पास , वो किसी और से बात कर रही थी और मेरी तरफ उसका ध्यान न था .......न वो मेरी बात सुन रही थी ....... सो मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के अपनी तरफ खीची , ठीक वैसे ही जैसे मैं अपनी माँ की पकड़ लेता था जब वो मेरी बात नहीं सुनती थी ......और उस दतखोड़ी ने मुझे बुरी तरह झिड़क दिया ....... मैं मासूम सहम गया ........ और मुझे ज़िन्दगी का पहला lesson मिला ....तुम्हारे माँ के अलावा दुनिया की कोई औरत तुम्हारी माँ नहीं हो सकती . और इस lesson को मैंने ज़िन्दगी भर याद रखा .......
फिर जब आगे चल कर हम लोग teaching में आ गए तो तो मैंने एक उसूल बनाया ........स्कूल में हमेशा बाप बन के रहा और मोनिका को हमेशा माँ बनना सिखाया ........
आजकल यहाँ सुल्तानपुर लोधी में , वो है तो प्रिंसिपल एक स्कूल की पर बच्चे सब उसे माँ ही समझते हैं ....... चढ़े रहते हैं सिर पे ....देखते ही भाग के आते हैं और लिपट जाते हैं टांगों से ........ ऑफिस में घुसे रहते हैं कैंडी लेने के लिए ........ एक बच्चे ने अपनी माँ से शिकायत की की प्रिंसिपल अब मुझे प्यार नहीं करती .......उसकी माँ स्कूल चली आई ......मैडम प्लीज ....... दो चार चुम्मियां ले लिया करो ......कहता है की अब प्यार नहीं करती प्रिंसिपल ....... अजी अब 5 th में हो गया है ....... अब इस से कहो की बड़ा हो जाए ........
जाने क्यों प्रिंसिपल जल्लाद की इमेज बना के रखती हैं स्कूल में ....माँ बन के भी अच्छा स्कूल चलाया जा सकता है .........

8 अक्टूबर.................खरीद के लायेंगे दुल्हन आपियों कौमनष्टों के लिए ......

उत्तर प्रदेश में कैसा भी बकलोल आदमी हो , उसका भी शादी ब्याह हो ही जाता है ....... चाहे खाने पीने उठने बैठने का ठिकान न हो , शादी हो ही जाती है .......मैंने आजतक वहाँ कोई यूँ ही छडा छांट घूमता नहीं देखा .....पंजाब हरियाणा में ऐसा नहीं है ........अच्छे खासे खाते पीते ठीक ठाक लोगों को मैंने एक अदद बीवी की आस में टहलते देखा है .......हरियाणा में तो समस्या महामारी का रूप ले चुकी है .......हर गाँव में 10-20 लंगवाडे ऐसे हैं जो 35-40 के हो गए पर ब्याह न हुआ ....... सो वहाँ ऐसी agencies खुल गयी हैं जो bihar , बंगाल , उड़ीसा से लडकियां खरीद के लाते हैं और यहाँ छड़ों की शादियाँ करवाते हैं .........और ऐसे गिरोह हैं हरियाणा पंजाब में जिनमे सुन्दर सुन्दर लडकियां औरतें होती हैं , जो ऐसे ही शिकार फंसा के बाकायदा शादी करती हैं और मौक़ा मिलते ही रुपया पैसा , गहना या जो कुछ मिले ले के रफू चक्कर .......
समाज में जब मैं लोगों को अपनी बीवियों पे चुटकुले सुनाते देखता हूँ तो हंसता हूँ .....बेटा तुमको बीवी मिल गयी है इसलिए मज़ाक सूझ रहा है ....उनसे पूछो जो तरस रहे हैं ......मैं यहाँ ऐसे दो चार लोगों को जानता हूँ जो छड़े हैं ........उन्हें छुप के घंटों observe करता हूँ ....मैंने देखा की वो सड़क पे बैठे हर आती जाती औरत को ऐसे निहारते हैं ......... कहीं किसी पारिवार्रिक माहौल में हों तो देखने लायक होता है उनका व्यवहार ...उनके हाव भाव ........ उनका रोम रोम तरसता है औरत के लिए ........विरह की आग में जलते ....... ऐसे लोगों को सब लोग अवॉयड करते हैं ........कोई इन्हें किसी function में बुलाना नहीं जानता ......लाल लुग्गा देखा नहीं की लासरियाने लगे ...........और ये समाज के लिए ख़तरा भी होते हैं ...... महिलाओं की सुरक्षा के लिए ख़तरा .....क्या पता कब किसके घर में घुस जाएँ .........
कौमनष्टों और आपियों का वही हाल है .....आपियों की बीवी गहना रुपया ले के चुपके से हाथ से फिसल गयी ......... कौमनष्ट वो जिनको कभी नसीब ही न हुई ........बेचारे धधकते कोयले से आग बरसाते हैं ........ ये अब 40-45 के हो चुके ......अब इनको सत्ता सुन्दरी नसीब होगी नहीं कभी .......... खरीद के देनी पड़ेगी इनको बीवी ........
इनका कुछ जुगाड़ बनाओ भैया .......... खरीद के लाओ कहीं से ....कहीं साइड से ....कोई बंगालन उडिया सत्ता सुन्दरी ........ samar anarya जैसों को धधकते देखता हूँ तो तरस आता है .........मोदी को सत्ता सुन्दरी के साथ देख के उनसे बर्दाश्त नहीं होता ......

9 October .............कौमनष्ट watch .........communist खतरे में ......

कौमनष्ट watch .........
किसी जमाने में धरती पे एक कौम थी . धीरे धीरे वो नष्ट हो गयी ......... कुछ समाज विज्ञानियों ने समय रहते ये पहचान लिया था की ये कौम नष्ट हो जायेगी ....... इसलिए इन्होने इनके संरक्षण के प्रयास शुरू किये.......... सबसे पहले तो इनको endangered species में रखा ......... इनके पंजे गिने गए ....... इनको सरकारी खुराक पे पालना शुरू किया ......इनके लिए JNU जैसे अभयारण्य बनाए ..........अभयारण्य बोले तो sanctuary ......जहां ये निश्चिन्त हो के चर खा सकें ......... सरकार ने भी ये बेवस्था की की इनकी सुरक्षा हो ....सुरक्षा बोले तो इनको मार के कोई खाल न उतार ले .....यानि कोई इनको पटक के मारने न पाए ........
जो गिनती के कौम नष्ट बचे थे उन्हें महत्वपूर्ण पदों पे बैठाया ...मसलन इतिहासकार......... पत्रकार ........कलाकार ........ फिल्मकार .....कहने का मतलब ऐसे पदों पे बैठाया जहां ये कार नामे कर सकें .......... सरकारी संरक्षण के परिणाम जल्दी ही दिखने लगे और ये खा खा के मोटा गए ......और इनके पिछवाड़े यानी posterior cavity के इर्द गिर्द चर्बी की मोटी परत जम गयी .......... दुनिया भर में रिसर्च हुई की ये प्रजाति आखिर लुप्त क्यों हो रही है .....पाया गया की इनके DNA में ही दोष है ........
समाज में भी धीरे धीरे इनको ले के जागरूकता आई .......... लोग इनको watch करने लगे ....... नज़र रखने लगे .....क्या खाते हैं ....कहाँ रहते हैं ......इनको खुराक कहाँ से मिलती है ...... आदतें क्या हैं ....... किस खुराक से जल्दी मोटाते हैं .......
मैंने भी एक कौमनष्ट के गले में collar पहनाया है .......आजकल उसका सिग्नल उधर hongkong और नेपाल के जंगलों से मिल रहा है ........ उसके पीछे कैमरा लगा दिया है ....... सारा दिन हुआँ हुआँ करता है ...... उसकी हुआँ हुआँ पे एक साथ बहुत से शांति दूत कू कू भौ भौ करते हैं ........ इधर देखा गया है की उसकी हर आवाज़ पे शांति के पुजारी ज़्यादा बोलते हैं .......
मेरा कैमरा लगा है पीछे ....उसपे कड़ी नज़र है ....... सारी रिपोर्ट देता रहूँगा .....आप लोग भी नज़र रखिये ...........
क्रमशः ...............




कौमनष्ट watch .........
जिस कौमनष्ट को हमने पट्टा पहनाया था , वो घूमता चरता उधर पकिस्तान बॉर्डर पे चला गया .... वहाँ बड़ा धूम धडाका था ...धांय धांय थी ........ कौम नष्ट धूम धडाके में पतला गोबर छेरने लगता है ....... कौम नष्ट मोदी जी मोदी जी करता भगा जो बॉर्डर से ....छिपने की जगह न मिली ........ मोदी जी के 56 साइज़ छाती के पीछे छिपने के जगह खोजता रहा बेचारा .........
कौमनष्ट बोला मोदी जी ...... बॉर्डर पार के लिए 56 इंच की छाती नहीं 57 MM की तोप चाहिए ...... मोदी बोले .....बेटा कौमनष्ट ..... तोप हथियार सब है ....... और सुनो हमारा हथियार की लम्बाई mm में नहीं इंच में है ....... और सुनो कौमनष्ट .......हथियार सबके पास होते हैं .......पर मारने के लिए कलेजा चाहिए बेटा छाती में ............समझे ? बोलो तो निकालूँ ? बिना तेल लगाए मारूंगा .......
और मोदी ने निकाला जो हथियार ......तो कौमनष्ट चला भाग ....... कौमनष्ट भगा तो जा के रुका hongkong .....उधर पकिस्तान भगा तो सुना है की UN गया है ........ दोनों पतला गोबर छेर रहे हैं ....